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डॉ. श्रीराम लागू का अंतिम संस्कार शुक्रवार दोपहर राजकीय सम्मान के साथ पुणे, महाराष्ट्र में किया गया

डॉ. श्रीराम लागू का अंतिम संस्कार शुक्रवार दोपहर राजकीय सम्मान के साथ पुणे, महाराष्ट्र में किया गया। हालांकि, हिंदू रिवाज के तहत अंतिम संस्कार की रस्में अदा नहीं की गईं। दिवंगत लागू के दामाद डॉ. श्रीधर कानेटकर के मुताबिक, “वे भगवान को नहीं मानते थे और चाहते थे कि हिंदू धर्म के तहत उनका अंतिम संस्कार न किया जाए। वे जो चाहते थे, हमने उसका सम्मान किया।”

भारतीय रंगमंच और सिनेमा के महान कलाकार श्रीराम लागू का नाम उस चमकते सितारे के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अभिनय में एक नई परिभाषा लिखी. उनका जन्म 16 नवंबर 1927 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था. अभिनय की दुनिया में आने से पहले वह एक सफल डॉक्टर भी थे, लेकिन कला और मंच के प्रति उनका प्रेम उन्हें अभिनय की ओर खींच लाया.

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श्रीराम लागू ने बताया था- दो मिनट के सीन में इतना रोना-धोना था कि आंखें सूज गई थीं

5 वर्ष पहले

 

श्रीराम लागू ने बताया था- दो मिनट के सीन में इतना रोना-धोना था कि आंखें सूज गई थीं|बॉलीवुड,Bollywood – Dainik Bhaskar

छह दिन फिल्मों का काम और हर संडे मैंने थिएटर को दिया।

डॉ. श्रीराम लागू के देहावसान पर तबस्सुम ने भास्कर से उनका यह खास साक्षात्कार शेयर किया

लागू ने थिएटर और फिल्मों को साथ-साथ वक्त दिया, लेकिन उनका ज्यादा मन थिएटर में लगता था

मुंबई/पुणे. डॉ. श्रीराम लागू ने सैंकड़ों फिल्मों भले ही की हों पर उनका दिल हमेशा थिएटर के लिए ही धड़कता रहा। पुराने जमाने की फेमस अभिनेत्री तबस्सुम ने उनका एक साक्षात्कार अपने कार्यक्रम तबस्सुम टॉकीज के लिए लिया था, जिसमें डॉ. लागू अपने थिएटर प्रेम का खुलकर इजहार करते नजर आते हैं। डॉ. श्रीराम लागू के देहावसान पर तबस्सुम ने भास्कर से उनका यह खास साक्षात्कार शेयर किया। डॉ. लागू ने बताया, “मैं एक जमाने में सर्जन था। नाक कान और गले का डॉक्टर था। जिस साल मैं मेडिकल कॉलेज में गया उसी साल से मैंने थिएटर शुरू किया था। बस थिएटर का शौक था। जब मैं हिंदी फिल्मों में व्यस्त हो गया तो एक समय ऐसा आया जब मैं थिएटर बिल्कुल कर ही नहीं रहा था। तब मुझे महसूस हुआ कि यह मेरी जिंदगी में बहुत गलत चीज हो रही है। इस से काम नहीं चलेगा। थिएटर तो मेरी जिंदगी है। इसे तो मुझे करते ही रहना चाहिए। इस चीज का अहसास होते ही मैं थिएटर की ओर वापस गया और हर संडे मैंने थिएटर करना शुरू किया। बाकी छह दिन फिल्मों का काम करना शुरू किया। जो लोग फिल्मों में बिजी होने के बाद थिएटर को बिल्कुल भुला देते हैं, उन्हें महसूस नहीं होता कि थिएटर उनके लिए बहुत जरूरी है। पर मेरे लिए यह बहुत जरूरी था। मैं मुंबई के छबीलदास स्कूल में थिएटर किया करता था। मैंने शुरू से यह कभी नहीं माना कि एक्सपेरिमेंटल थिएटर अलग होता है और कमर्शियल थिएटर अलग होता है। मैं बस इतना मानता हूं कि एक अच्छा थिएटर होता है और एक बुरा थिएटर होता है। बिल्कुल ऐसा ही मेरा मानना फिल्मों के लिए भी है। यहां भी एक्सपेरिमेंटल और कमर्शियल सिनेमा अलग-अलग नहीं होती। एक्सपेरिमेंटल थिएटर भी मैंने किया और कमर्शियल थिएटर भी मैंने किया, लेकिन थिएटर करते वक्त थिएटर की तरफ देखने का मेरा एक ही अंदाज था कि जो थिएटर मैं कर रहा हूं वह अच्छा थिएटर है या बुरा थिएटर है।”

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